अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो, तो कचरे जैसी चीस के भी खरीदार मिल जाते हैं।
कई अवसरों पर जो चीस हमारे लिए कचरा होती हो वही किसी दुसरे के लिए कच्चा माल हो जाती है। दूरदर्शी व्यवसाई आमतोर पर फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकले इस तरह के अपसिष्टों का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। इसका उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:- गैस की भारी किल्लत झेल रहे भारत को ओमान सरकार से ओद्योगिक कोयले से गैस एक्स्चेंग का प्रस्ताव मिला है। भारतीय ओद्योगिक कोयले की गुढ़वत्ता कोई खास अच्छी नहीं होती है और इसमे राख की भारी मात्रा मौजूद होती है, इसके बाद भी ओमान सरकार इसको क्यों पाना चाहती है ? इसका एक बेहद ही रोचक जवाब है।गौरतलब है की हमारे कोयले मै राख का ऊँचा स्तर उर्जा उत्पादन में अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन ओमान सरकार को उर्जा उत्पादन के लिए कोयला चाहिऐ ही नहीं। उर्जा के लिए वो तेल का उत्पादन करती है। दरअसल उच्च राख वाला कोयला व्यापक परिमाण में सीमेंट के उत्पादन मै महती भूमिका निभाता है। यही वजह है कि ओमान सरकार खराब कोयले के बदले हमे गैस देने के लिए बहुत उत्सुकता दिखा रही है। निश्चित रूप से ये दोनों सरकारों के लिए लाभ ही लाभ का सौदा है। सच्चाई तोये है की ओमान में कंस्ट्रक्शन ओद्योग का बाजार गरमाया हुआ है। ओमान ही क्यों दुबई और आस पास के बाजार भी इस द्रष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। भवन निर्माण संबंधी उपकर्णो का विश्व का एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों मै स्थित है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं अगर ओमान हमारे निम्न्कोटी के कोयले में इतनी रूचि दर्शा रहा है। फंडा यह है की अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो तो कचरे जैसी नाचीज़ के खरीदार भी मिल जाते हैं।
मेनेजमेंट कोई विज्ञान नहीं हैं
आज जहाँ हर जगह मेनेजमेंट गुरु और किताबें छाई हुई हैं, हमें अच्छी तरह समझ लेना होगा के मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमारे काम के प्रदर्शन से ही होती हैं
देश भर में फैले बुक स्टोर मेनेजमेंट की किताबों से अटे पड़े हैं। बिभिन्न क्षेत्रों और स्तरों पर काम करने वाले लोग सफलता के लिए मेनेजमेंट गुरुओं द्वारा लिखी पुस्तकों के बारे में पूछते रहते हैं। दरअसल हमारे देश की अर्थव्यवस्था या हमारी सामाजिक क्रियाशीलता को जितनी क्षति लाइसेंस के जरिये मेनेजमेंट विषय को पेशेवरों तक सीमित करने की कोशिश से पहुंचेगी, उतनी और किसी तरह से नहीं। लाइसेंस का मतलब इस बात से हैं की मेनेजमेंट के गलियारों में सिर्फ़ एक मेनेजमेंट- डिग्रीधारी ही प्रवेश करने का अधिकारी है सकता हैं। महान मेनेजमेंट गुरू पोटर ऍफ़ ड्रकर अपनी ताजातरीन पुस्तक दा डेली ड्र्कर में कहते हैं की यह सबसे बड़ी गलती हम सभी विभिन्न स्तरों पर करते हैं। वे कहते हैं की कुछ विशेष शैक्षणिक डिग्रीधारी लोगों तक मेनेजमेंट पदों को सीमित कर उधमी गलतियाँ करते जा रहे हैं। वे आगे कहते हैं की कुशल मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमेशा आपके काम के प्रदर्शन से ही होती हैं। मेनेजमेंट को इस कसौटी पर कसा जाता हैं की यह काम वालों को अपना काम करने देता हैं या नहीं। दुनिया भर में बहुसंख्यक उधमी मेनेजमेंट को एक वैज्ञानिक और कुछ लोगों तक सीमित प्रोफेशन वाले ब्रांड का रूप देने में लगे हैं। ड्र्कर इस सोच को आर्थिक विकास के लिए बाधक मानते हैं। फंडा यह हैं की मेनेजमेंट यानी प्रबंधन का लक्ष्य और उद्देश्य ज्ञान के बजाये उपलब्धियाँ होनी चाहिए।
जीतने की कला Comment रामायण का एक मशहूर पात्र था बाली..वानर वंश के इस प्रतापी राजा की खूबी थी कि जब कभी इसका कोई प्रतिद्वंद्वी सामने आकर उसे युद्ध के लिए ललकारता था...तो बाली पलक झपकते दुश्मन पर टूट पड़ता था...और, बाली कभी हारता नहीं था...आखिर ऐसा क्या था बाली में जिसने उसे अविजित बना रखा था..यह राज बाली के छोटे भाई और उसके प्रबल दुश्मन सुग्रीव ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने तब खोला जब श्रीराम सुग्रीव की तरफ से बाली का संहार करने गये थे..सुग्रीव ने श्रीराम को सलाह दी कि किसी भी हालत में बाली के सामने आकर उस पर वार मत कीजिएगा...क्योंकि, बाली को वरदान है कि जो कोई भी दुश्मन उसके सामने आएगा..उसकी आधी ताकत बाली को अंदर आ जाएगी..श्रीराम ने इस सलाह पर अमल करते हुए एक पेड़ के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाये...और बाली मारा गया..हांलाकि, छुप कर दुश्मन की हत्या करने का पाप भी श्रीराम पर चढा और उन्हे खासी आलोचना का शिकार भी बनना पड़ा..बहरहाल, हम यहां उस भेद पर चर्चा करने की कोशिश करेंगे कि कैसे बाली अपने दुश्मन से आधी ताकत खींच लेता था...मेरा मानना है कि इस ताकत के पीछे बाली का वह एटीच्यूड या मनोभाव जिम्मेदार था जिसे बाली ने खासी साधना के बल पर अर्जित किया था...अमूमन हम जब किसी प्रतिस्पर्धी या दुश्मन के सामने पड़ते ही गुस्से या नफरत की उमड़ती प्रचंड लहरों के सैलाब में बह जाते हैं.. हमारा दिमाग उस वक्त वर्तमान से अधिक अतीत के उन पन्नों को खंगालने लगता है जिसमें उस प्रतिस्पर्धी ने तमाम तरह से हमारा नुकसान करने की कोशिश की...अतीत की यादें हमारे जहन को इतना जहरीला कर देती हैं कि हम अपना आपा खोकर दुश्मन पर टूट पड़ते हैं.. होश खोकर किया गुस्सा अक्सरहां हमारे सोचने की शक्ति छीन लेता है और अमूमन हमारे दांव इतने कमजोर पड़ जाते हैं कि हम अपने से कमजोर दुश्मन से भी या तो हार जाते हैं या उससे भय खाने लगते हैं...अब इसकी जगह यदि हम अपनी रणनीति बदल लें... यानी अतीत को भूलकर सिर्फ वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें तो... जाहिर है कि हम गुस्से की उस प्रचंड धारा में बहने से बच जाएंगे जो उस वक्त हमारा होश छीन लेती है...अब इसके साथ ही यदि हम यह सोचें कि सामने वाला प्रतिस्पर्धी वस्तुत:हमारा शुभचिंतक है जो हमारी शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेने आया है..ताकि वक्त के साथ हम और मजबूत होकर उभड़ें...तो ऐसी सोच का क्या असर होगा...दुश्मन पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़े या नहीं...हम पर तो निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा...प्रबल दुश्मन के सामने भी हमारी सोच भावना के सैलाब में नहीं बहेगी..हम उस वक्त ठंडे दिमाग से अपना फैसला ले पाएंगे...दुश्मन की कमजोरी को सही ढंग से भांप पाएंगे...और उसे पराजित करने का अचूक फार्म्यूला उपाय में ला पाएंगे..जाहिर है कि इसके नतीजे भी हमें सकारात्मक ही मिलेंगे..अगर हमने होश बना रखा है और दुश्मन होश खो चुका है तो इसका फायदा किसे मिलना है क्या यह भी बताने की बात है..
क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड...
आजकल ये दोनों प्रकार के कार्ड खूब चल रहे है. बाज़ार में खरीदारी करने जाइए और अपनी मरजी के किसी भी कार्ड से बिल चुकता कीजिए!
मै उस दिन बाज़ार गई; माईक्रोवेव खरीदना था!बिल मैने अपने डेबिट कार्ड से चुकाया.पता चला कि उसके बदले में 3% कैश बैक मिलेगा;बडा ही अच्छा लगा.इससे पहले क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से मेरे 400 प्वाइंट बन चुके थे.
...अब मैने और जानकारी लेने के आशय से पूछताछ की...तो पता चला कि मेरे एसबीआई के क्रेडिट कार्ड से अगर मै माइक्रोवेव की खरीदारी करती,तो मेरे लगभग 600 से उपर प्वाइंट बनते और इसपर एसबीआई से संपर्क करने पर मुझे अच्छा गिफ्ट भी मिल सकता था.वैसे 400 प्वाइंट बनने पर भी मै गिफ्ट की हकदार हूं!
चाहे क्रेडिट कार्ड हो या डेबिट कार्ड...इनके सही इस्तेमाल की जानकारी जरुर होनी चाहिए.प्वाइंट्स को ध्यान रखकर इन्हें भुनाना भी जरुरी है.स्कीम्स में बद्लाव होते रहते है.. चौकन्ने रहने की जरुरत है.
Tuesday, July 7, 2009
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