Thursday, July 9, 2009

जितना गुड़ डालोगे उतना मीठा होगा

मैनेजमेंट फंडा
एन. रघुरामन.

हाल ही में अमेरिका से स्थानांतरित होकर भारत आए मेरे एक मित्र को ड्राइवर की आवश्यकता थी, क्योंकि वह मुंबई की सड़कों से परिचित नहीं थे। अपने अन्य कई दोस्तों से इस बाबत कहने-सुनने के बाद कुछ आवेदन पत्र आए। इनमें से एक आवेदन बेहद रोचक था, क्योंकि अभ्यर्थी ने उसमें स्पष्ट कर दिया था कि वह तब तक ड्राइवर की नौकरी करने को तैयार नहीं है, जब तक कि गाड़ी महंगी और आलीशान न हो।

चूंकि मैं जानता था कि मेरा दोस्त बीएमडब्ल्यू खरीदने वाला है, अत: मैंने उसे बुलवा भेजा। अनुभव के नाम पर उसने अभिनेत्री श्रीदेवी और उनके पति बोनी कपूर और अनिल कपूर के लिए काम किया हुआ था।

बॉलीवुड की इन नामचीन हस्तियों के साथ काम करने के उसके अनुभव के बाद मुझे निश्चित तौर पर लग रहा था कि वह शख्स समय का पाबंद होगा। अत: मैंने हरि प्रसाद सिंह नाम के उस अभ्यर्थी से पूछा कि वह कितने वेतन की अपेक्षा रखता है। इस पर उसने कहा ‘मैं तीन आधार पर वेतन लेता हूं।

अगर आप पीछे बैठकर मुझे दाएं या बाएं मुड़ने या धीमे चलाने की सलाह देते हैं तो मैं महज 5,500 रुपए लेता हूं। हालांकि इस तरह से कुछ ही दिनों में गाड़ी की बॉडी क्षतिग्रस्त हो जाती है। यदि आप मुझे सुबह 8.30 बजे बुलाते हैं और घर से 11.30 बजे निकलते हैं तो मैं जल्द ही बोर हो जाता हूं और पंद्रह-बीस दिन में नौकरी छोड़ देता हूं। इस तरह आपको नए सिरे से अपने लिए ड्राइवर की खोज करनी पड़ेगी अत: ऐसी स्थिति में 6,500 रुपए लेता हूं।

अगर आप पीछे चुपचाप बैठते हैं और बस मुझे गंतव्य बता देते हैं, तो मैं निर्धारित समय में बिल्कुल सही जगह पर आपको पहुंचा दूंगा। फिर आप चाहे जिस वक्त वापस लौटें, मैं चुपचाप आपको लेकर आऊंगा। इसके लिए मैं कभी आपसे ओवरटाइम भी नहीं मागूंगा, बस वेतन 8,000 रुपए प्रतिमाह लूंगा।’ इसके बाद वह एक ही सांस में फिर बोला, ‘मैं आपको एक और बात बताना चाहता हूं। श्रीदेवी गाड़ी में पीछे बैठकर लिपस्टिक लगाती थीं। एक बार भी ऐसा मौका नहीं आया जब उन्हें लिपस्टिक लगाने में कोई दिक्कत हुई हो।

मेरी ड्राइविंग की कुशलता को समझने के लिए शायद यह बात पर्याप्त होगी।’ अगले ही क्षण वह बतौर ड्राइवर नौकरी पर रखा जा चुका था और मेरा वह दोस्त भी हर लिहाज से संतुष्ट लग रहा था। वह ड्राइवर मुंबई की सड़कों को अच्छे से जानता था, समय को लेकर बाद में चिल्लपों नहीं करने वाला था और फिर उसे सलीके से पहनना-ओढ़ना आता था। फंडा यह है कि जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा।

लोकप्रिय बनाता है शिष्टाचार
अगर मैं मुंबई में हूं तो ऑफिस से लौटते वक्त अपने दोस्त बलजीत परमार को हर रोज उनके घर ड्रॉप करता हूं। उनका घर जुहू में अमिताभ बच्चन के घर के बहुत करीब है। इस तरह मुझे यह अहसास होता है कि मैंने शहर में बढ़ते प्रदूषण के स्तर में कुछ कमी तो की।
हालांकि उन्हें ड्रॉप करने का सिर्फ यही एक कारण नहीं है। उन्हें जुहू की चांद सोसायटी पर उतारते वक्त मुझे कई बार अमिताभ बच्चन के दर्शन भी हो जाते हैं। कम से कम पांच में से तीन बार तो ऐसा होता ही है। चांद सोसायटी एक मध्य वर्ग सोसायटी है, जिसके ग्राउंड फ्लोर पर अमिताभ बच्चन की निजी सचिव रोजी सिंह भी रहती हैं। प्रत्येक रात नौ से दस के बीच अमिताभ बच्चन स्वयं कार से उन्हें घर छोड़ने आते हैं। वह तब तक बिल्डिंग के बाहर रुकते हैं, जब तक कि रोजी अपने घर में प्रवेश नहीं कर जाती।
रोजी, अमिताभ बच्चन की बेहद विश्वसनीय सहयोगी हैं और उनके साथ लंबे समय से हैं। यहां तक कि अमिताभ बच्चन का जब खराब दौर चल रहा था तब भी रोजी ने उनका साथ नहीं छोड़ा था। इससे मुझे वर्षो पूर्व कोलकाता की एक घटना याद आ गई। उस रात अमिताभ बच्चन ने वहां पार्टी दी थी। मैंने रात के लगभग दो बजे उन्हें अपनी एक साथी पत्रकार को रूम तक छोड़कर आते देखा। वह एक पंच सितारा होटल था और हम सभी पार्टी में मशगूल थे।
इस पर उस महिला पत्रकार ने अमिताभ बच्चन से पूछा कि पंच सितारा होटल के सुरक्षित माहौल में भी वह उन्हें कमरे तक छोड़ने क्यों आए हैं? इस पर उनका जवाब था, ‘यह सामान्य शिष्टाचार है। अगर आप मेजबान हैं तो रात हो जाने पर महिला अतिथि को छोड़ना आपकी जिम्मेदारी है।’ इससे मुझे उनसे जुड़ी एक और याद ताजा हो आई।
एक यात्रा के दौरान जिसमें महिला पत्रकारों की संख्या पुरुष पत्रकारों से ज्यादा थी, अमिताभ बच्चन ने अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ उन्हें एक सुरक्षा घेरे में ले लिया था। संभवत: यही वजह है कि वह आज भी महिलाओं के चहेते बने हुए हैं। फंडा यह है कि शिष्टाचार के बल पर आप सभी से त्वरित सम्मान पाने के हकदार हो जाते हैं। यही नहीं, इससे लोकप्रियता में भी इजाफा होता है।

मैनेजमेंट फंडा

मैनेजमेंट फंडा.शाहरुख खान की एक हिट फिल्म का संवाद है, ‘कोई चीज अगर दिल से चाहो तो सारी कायनात आपकी उस चाहत को पूरा करने में लग जाती है।’ इसकी पुष्टि करती एक सच्ची घटना पर गौर न्यूयार्क शहर में रहने वाली एक छोटी लड़की अपने पिगी बैंक को खाली कर अपने घर से कुछ दूर स्थित एक दवा की दुकान पर पहुंचती है। दुकान मालिक उस लड़की की तरफ कोई ध्यान नहीं देता, क्योंकि वह शिकागो से आए अपने भाई से बातें करने में मशगूल होता है। लड़की की तेज आवाज से उसे बातचीत करने में परेशानी आती है। यह देखकर वह चिड़चिड़े लहजे में उससे पूछता है, ‘क्या चाहती हो? देख नहीं रही हो मैं अपने भाई से बात कर रहा हूं जो बहुत दिनों बाद मुझसे मिलने आया है!’

यह सुनकर लड़की भी उतने ही तेज अंदाज में बोलने की कोशिश करते हुए जवाब देती है, ‘मैं भी आपसे अपने भाई के बारे में बात करना चाहती हूं। वह बहुत बीमार है.. और मैं कोई चमत्कार खरीदने आई हूं।’

यह सुनकर दुकानदार थोड़ा अचरज से बोला, ‘फिर कहो.. तुम क्या चाहती हो?’

लड़की बोली, ‘मेरे भाई का नाम एंड्रयू है और उसके सिर के भीतर कुछ हो गया है। मेरे पिताजी का कहना है कि अब कोई चमत्कार ही उसे बचा सकता है। मैं वही चमत्कार लेने आई हूं, कितने का है चमत्कार?’

यह सुनकर दुकानदार थोड़े नरम लहजे में बोला, ‘प्यारी बच्ची, हम यहां कोई चमत्कार नहीं बेचते हैं। मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।’

इस पर वह लड़की फिर बोली, ‘सुनिए, मेरे पास उस चमत्कार की कीमत चुकाने लायक रकम है। आप सिर्फ यह बताइए वह कितने का है। अगर रकम कम पड़ेगी, तो मैं बाकी का बंदोबस्त भी कर लूंगी।’

सारी बातें सुन रहा उस दुकान मालिक का भाई पहनावे से एक भद्र शख्स लगता था। वह दुकान से नीचे उतरा और लड़की से प्यार जताते हुए बोला, ‘तुम्हारे भाई को किस तरह के चमत्कार की जरूरत है?’

वह लड़की डबडबाई आंखों के साथ बोली, ‘मुझे नहीं मालूम। मुझे सिर्फ इतना मालूम है कि वह बहुत ज्यादा बीमार है और मम्मी कह रही थीं कि उसे ऑपरेशन की जरूरत है, लेकिन मेरे पिताजी के पास उसके लिए इतना पैसा नहीं है। इसीलिए मैं अपने पिगीबैंक में जमा पैसों से उसके लिए चमत्कार खरीदने आई हूं।’ यह सुनकर शिकागो से आया हुआ वह शख्स बोला, ‘तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?’

इस पर वह लड़की बमुश्किल जवाब दे पाई, ‘एक डॉलर और ग्यारह सेंट। मेरे पास फिलहाल यही है, लेकिन अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं कुछ और रकम भी जुटा लूंगी।’

यह सुनकर वह शख्स मुस्कराते हुए बोला, ‘कितने संयोग की बात है कि तुम्हारे पास एक डॉलर और ग्यारह सेंट हैं और इतनी ही कीमत में चमत्कार मिल जाता है।’ इसके बाद उसने एक हाथ में लड़की द्वारा लाई गई रकम ली और दूसरे हाथ से लड़की का हाथ थाम कर बोला, ‘मुझे अपने घर ले चलो। मैं तुम्हारे भाई और मम्मी-पापा से मिलना चाहता हूं। हो सकता है कि तुम्हें जिस चमत्कार की जरूरत है, वह मेरे पास हो।’ वास्तव में वह शख्स न्यूरो सर्जरी विशेषज्ञ डॉ, कार्लटन आर्मस्ट्रांग थे। उन्होंने वह ऑपरेशन मुफ्त में किया और कुछ समय बाद उस लड़की का भाई ठीक होकर घर लौट आया। इसके बाद ईश्वर का धन्यवाद देते हुए उसकी मां बोली, ‘वह ऑपरेशन वास्तव में चमत्कार से कम नहीं था। मुझे नहीं पता कि उसका कितना खर्च आया होगा!’ यह सुनकर लड़की मुस्कराई, क्योंकि उसे अच्छे से मालूम था कि उस चमत्कार की क्या कीमत थी, महज एक डॉलर और ग्यारह सेंट और उस नन्ही लड़की का विश्वास।फंडा यह है कि अगर विश्वास है तो चमत्कार भी होते हैं। विश्वास बनाए रखने से बड़े से बड़ा काम हो जाता है।



एक-दूसरे को समझने की कला by N.Raghuraman


भोपाल में एक गैर-सरकारी संगठन ‘अरुषि’ चलाने वाले अनिल मुद्गल ने जब मुझे पहली बार पश्चिम-मध्य रेलवे का आरक्षण फॉर्म दिखाया, तो उसमें कुछ विशेष न ढूंढ़ पाने के कारण मैं थोड़ा भ्रमित था। वास्तव में इस फॉर्म पर एक तरफ हिंदी और अंग्रेजी में दिशा-निर्देश दिए हुए थे, जबकि दूसरी तरफ ब्रेल लिपि में कुछ लिखा हुआ था। मैं अचंभित था, अत: अनिल ने पूरी बात विस्तार से बताई।

उन्होंने मुझसे एक प्रश्न पूछा, ‘ऐसा कितनी बार होता है कि आप अपनी दुआ-सलाम का जवाब न देने वाले के बारे में गलत राय बनाते हैं?’ इस पर मैंने कहा, ‘यदि मैं उस शख्स को जानता हूं तो उसे भूल-चूक ही मानूंगा। मैं समझूंगा कि वह हाल-फिलहाल किसी बात में उलझा होगा, इसलिए मेरी दुआ-सलाम का जवाब नहीं दे पाया।’

इस पर अनिल ने कहा, ‘बिल्कुल सही बात है। आप उस शख्स को अच्छी तरह जानते हैं, इसीलिए कोई त्वरित राय नहीं बनाते। अन्यथा अधिकांश मामलों में हम राय निर्धारण के मामले में हठीले रवैया का ही परिचय देते हैं। कारण, अक्सर हम किसी शख्स को अच्छे से नहीं जानते हैं। अत: उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाते और उसे सराह नहीं पाते।’

फिर अनिल ने तार्किक ढंग से इस बात को आरक्षण फॉर्म के पिछले हिस्से में ब्रेल लिपि में छपे दिशा-निर्देशों से जोड़ा। यह सफल प्रयास अरुषि की ही देन है। उनके मुताबिक किसी खास स्थिति को समझने और उसे सराहने के लिए उसके बारे में जागरूकता फैलना ही एकमात्र रास्ता है। इसीलिए उन्होंने नेत्रहीनों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने के लिए रेलवे को माध्यम बनाने की सोची।

इससे पहले पश्चिम-मध्य रेलवे के आरक्षण फॉर्म एक-एक तरफ हिंदी और अंग्रेजी में छपे होते थे। यह देख अरुषि के लोगों ने रेलवे प्रशासन से इस फॉर्म की सार्थकता पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि फॉर्म के एक ही तरफ दोनों भाषाओं में दिशा-निर्देश छपे होने से खर्च बचेगा। उनका यह तर्क जब रेलवे प्रशासन के गले उतरने लगा तो अरुषि ने फॉर्म के पिछली तरफ ब्रेल लिपि में दिशा-निर्देश छापने का सुझाव रखा। इस बारे में उनका तर्क साधारण था।

आरक्षण के लिए लाइन लगाए लोग, भले ही कम संख्या में सही, अगर उस फॉर्म के पिछली तरफ उभरे अक्षरों को देखते हैं तो उन्हें पता चल जाएगा कि किस तरह नेत्रहीन सामान्य से काम के लिए भी जद्दोजहद से गुजरते हैं। इस तरह उन्हें समझ आएगा कि उनके साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहिए।

इसके अलावा अधिकांश यात्रियों की प्रवृत्ति दो आरक्षण फॉर्म लेने की होती है। एक तो वह भरकर काउंटर पर ही जमा कर देते हैं, जबकि दूसरा घर ले आते हैं। अगर उनमें से कुछ ने बाद में ब्रेल लिपि को पढ़ा और अन्य दूसरे लोगों को बताया तो हमारा उद्देश्य फिर भी पूरा हो जाएगा।

भले ही यह एक छोटी शुरुआत हो, लेकिन इसका मकसद बहुत बड़ा है। यहां बात सिर्फ नेत्रहीनों की नहीं है, बल्कि इसका आशय सभी को यथोचित सम्मान और प्रेम देने की है। दुनिया भर में कटु शब्द या द्वेष का भाव सामने वाले को न जानने या उसे जानने के प्रयास न करने के कारण ही उपजता है। इस लिहाज से सभ्य और असभ्य के बीच की जो बारीक रेखा है उसका निर्धारण परस्पर समझ की कला पर निर्भर है।

यकीन मानिए फंडा यह है कि इस दिशा में थोड़ा सा प्रयास भी इस दुनिया को रहने लायक एक बेहतर स्थान बनाने में महती भूमिका निभा सकता है।

Tuesday, July 7, 2009

सब कुछ बिकता है

अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो, तो कचरे जैसी चीस के भी खरीदार मिल जाते हैं।

कई अवसरों पर जो चीस हमारे लिए कचरा होती हो वही किसी दुसरे के लिए कच्चा माल हो जाती है। दूरदर्शी व्यवसाई आमतोर पर फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकले इस तरह के अपसिष्टों का अधिकतम लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। इसका उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:- गैस की भारी किल्लत झेल रहे भारत को ओमान सरकार से ओद्योगिक कोयले से गैस एक्स्चेंग का प्रस्ताव मिला है। भारतीय ओद्योगिक कोयले की गुढ़वत्ता कोई खास अच्छी नहीं होती है और इसमे राख की भारी मात्रा मौजूद होती है, इसके बाद भी ओमान सरकार इसको क्यों पाना चाहती है ? इसका एक बेहद ही रोचक जवाब है।गौरतलब है की हमारे कोयले मै राख का ऊँचा स्तर उर्जा उत्पादन में अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन ओमान सरकार को उर्जा उत्पादन के लिए कोयला चाहिऐ ही नहीं। उर्जा के लिए वो तेल का उत्पादन करती है। दरअसल उच्च राख वाला कोयला व्यापक परिमाण में सीमेंट के उत्पादन मै महती भूमिका निभाता है। यही वजह है कि ओमान सरकार खराब कोयले के बदले हमे गैस देने के लिए बहुत उत्सुकता दिखा रही है। निश्चित रूप से ये दोनों सरकारों के लिए लाभ ही लाभ का सौदा है। सच्चाई तोये है की ओमान में कंस्ट्रक्शन ओद्योग का बाजार गरमाया हुआ है। ओमान ही क्यों दुबई और आस पास के बाजार भी इस द्रष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। भवन निर्माण संबंधी उपकर्णो का विश्व का एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों मै स्थित है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं अगर ओमान हमारे निम्न्कोटी के कोयले में इतनी रूचि दर्शा रहा है। फंडा यह है की अगर आपके पास बिस्नस माइंड हो तो कचरे जैसी नाचीज़ के खरीदार भी मिल जाते हैं।

मेनेजमेंट कोई विज्ञान नहीं हैं

आज जहाँ हर जगह मेनेजमेंट गुरु और किताबें छाई हुई हैं, हमें अच्छी तरह समझ लेना होगा के मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमारे काम के प्रदर्शन से ही होती हैं

देश भर में फैले बुक स्टोर मेनेजमेंट की किताबों से अटे पड़े हैं। बिभिन्न क्षेत्रों और स्तरों पर काम करने वाले लोग सफलता के लिए मेनेजमेंट गुरुओं द्वारा लिखी पुस्तकों के बारे में पूछते रहते हैं। दरअसल हमारे देश की अर्थव्यवस्था या हमारी सामाजिक क्रियाशीलता को जितनी क्षति लाइसेंस के जरिये मेनेजमेंट विषय को पेशेवरों तक सीमित करने की कोशिश से पहुंचेगी, उतनी और किसी तरह से नहीं। लाइसेंस का मतलब इस बात से हैं की मेनेजमेंट के गलियारों में सिर्फ़ एक मेनेजमेंट- डिग्रीधारी ही प्रवेश करने का अधिकारी है सकता हैं। महान मेनेजमेंट गुरू पोटर ऍफ़ ड्रकर अपनी ताजातरीन पुस्तक दा डेली ड्र्कर में कहते हैं की यह सबसे बड़ी गलती हम सभी विभिन्न स्तरों पर करते हैं। वे कहते हैं की कुछ विशेष शैक्षणिक डिग्रीधारी लोगों तक मेनेजमेंट पदों को सीमित कर उधमी गलतियाँ करते जा रहे हैं। वे आगे कहते हैं की कुशल मेनेजमेंट की असली परीक्षा हमेशा आपके काम के प्रदर्शन से ही होती हैं। मेनेजमेंट को इस कसौटी पर कसा जाता हैं की यह काम वालों को अपना काम करने देता हैं या नहीं। दुनिया भर में बहुसंख्यक उधमी मेनेजमेंट को एक वैज्ञानिक और कुछ लोगों तक सीमित प्रोफेशन वाले ब्रांड का रूप देने में लगे हैं। ड्र्कर इस सोच को आर्थिक विकास के लिए बाधक मानते हैं। फंडा यह हैं की मेनेजमेंट यानी प्रबंधन का लक्ष्य और उद्देश्य ज्ञान के बजाये उपलब्धियाँ होनी चाहिए।

जीतने की कला Comment रामायण का एक मशहूर पात्र था बाली..वानर वंश के इस प्रतापी राजा की खूबी थी कि जब कभी इसका कोई प्रतिद्वंद्वी सामने आकर उसे युद्ध के लिए ललकारता था...तो बाली पलक झपकते दुश्मन पर टूट पड़ता था...और, बाली कभी हारता नहीं था...आखिर ऐसा क्या था बाली में जिसने उसे अविजित बना रखा था..यह राज बाली के छोटे भाई और उसके प्रबल दुश्मन सुग्रीव ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने तब खोला जब श्रीराम सुग्रीव की तरफ से बाली का संहार करने गये थे..सुग्रीव ने श्रीराम को सलाह दी कि किसी भी हालत में बाली के सामने आकर उस पर वार मत कीजिएगा...क्योंकि, बाली को वरदान है कि जो कोई भी दुश्मन उसके सामने आएगा..उसकी आधी ताकत बाली को अंदर आ जाएगी..श्रीराम ने इस सलाह पर अमल करते हुए एक पेड़ के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाये...और बाली मारा गया..हांलाकि, छुप कर दुश्मन की हत्या करने का पाप भी श्रीराम पर चढा और उन्हे खासी आलोचना का शिकार भी बनना पड़ा..बहरहाल, हम यहां उस भेद पर चर्चा करने की कोशिश करेंगे कि कैसे बाली अपने दुश्मन से आधी ताकत खींच लेता था...मेरा मानना है कि इस ताकत के पीछे बाली का वह एटीच्यूड या मनोभाव जिम्मेदार था जिसे बाली ने खासी साधना के बल पर अर्जित किया था...अमूमन हम जब किसी प्रतिस्पर्धी या दुश्मन के सामने पड़ते ही गुस्से या नफरत की उमड़ती प्रचंड लहरों के सैलाब में बह जाते हैं.. हमारा दिमाग उस वक्त वर्तमान से अधिक अतीत के उन पन्नों को खंगालने लगता है जिसमें उस प्रतिस्पर्धी ने तमाम तरह से हमारा नुकसान करने की कोशिश की...अतीत की यादें हमारे जहन को इतना जहरीला कर देती हैं कि हम अपना आपा खोकर दुश्मन पर टूट पड़ते हैं.. होश खोकर किया गुस्सा अक्सरहां हमारे सोचने की शक्ति छीन लेता है और अमूमन हमारे दांव इतने कमजोर पड़ जाते हैं कि हम अपने से कमजोर दुश्मन से भी या तो हार जाते हैं या उससे भय खाने लगते हैं...अब इसकी जगह यदि हम अपनी रणनीति बदल लें... यानी अतीत को भूलकर सिर्फ वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें तो... जाहिर है कि हम गुस्से की उस प्रचंड धारा में बहने से बच जाएंगे जो उस वक्त हमारा होश छीन लेती है...अब इसके साथ ही यदि हम यह सोचें कि सामने वाला प्रतिस्पर्धी वस्तुत:हमारा शुभचिंतक है जो हमारी शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेने आया है..ताकि वक्त के साथ हम और मजबूत होकर उभड़ें...तो ऐसी सोच का क्या असर होगा...दुश्मन पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़े या नहीं...हम पर तो निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा...प्रबल दुश्मन के सामने भी हमारी सोच भावना के सैलाब में नहीं बहेगी..हम उस वक्त ठंडे दिमाग से अपना फैसला ले पाएंगे...दुश्मन की कमजोरी को सही ढंग से भांप पाएंगे...और उसे पराजित करने का अचूक फार्म्यूला उपाय में ला पाएंगे..जाहिर है कि इसके नतीजे भी हमें सकारात्मक ही मिलेंगे..अगर हमने होश बना रखा है और दुश्मन होश खो चुका है तो इसका फायदा किसे मिलना है क्या यह भी बताने की बात है..


क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड...

आजकल ये दोनों प्रकार के कार्ड खूब चल रहे है. बाज़ार में खरीदारी करने जाइए और अपनी मरजी के किसी भी कार्ड से बिल चुकता कीजिए!

मै उस दिन बाज़ार गई; माईक्रोवेव खरीदना था!बिल मैने अपने डेबिट कार्ड से चुकाया.पता चला कि उसके बदले में 3% कैश बैक मिलेगा;बडा ही अच्छा लगा.इससे पहले क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से मेरे 400 प्वाइंट बन चुके थे.

...अब मैने और जानकारी लेने के आशय से पूछताछ की...तो पता चला कि मेरे एसबीआई के क्रेडिट कार्ड से अगर मै माइक्रोवेव की खरीदारी करती,तो मेरे लगभग 600 से उपर प्वाइंट बनते और इसपर एसबीआई से संपर्क करने पर मुझे अच्छा गिफ्ट भी मिल सकता था.वैसे 400 प्वाइंट बनने पर भी मै गिफ्ट की हकदार हूं!

चाहे क्रेडिट कार्ड हो या डेबिट कार्ड...इनके सही इस्तेमाल की जानकारी जरुर होनी चाहिए.प्वाइंट्स को ध्यान रखकर इन्हें भुनाना भी जरुरी है.स्कीम्स में बद्लाव होते रहते है.. चौकन्ने रहने की जरुरत है.

Monday, July 6, 2009

बिहार एक एक्शन फिल्म है



बिहार एक एक्शन फिल्म है
Jai Prakash ChoukseySaturday, April 04, 2009 07:09 [IST]


यूं तो पूरा भारत ही फिल्ममय है, परंतु बिहार से बड़ा सिनेमा प्रेमी कोई और प्रांत नहीं है। कई बार भ्रम होता है कि बिहार का जीवन किसी फिल्मी पटकथा का ही हिस्सा है।

फिल्मकार प्रकाश झा की पहली फिल्म ‘दामुल’ से लेकर निर्माणाधीन ‘राजनीति’ तक सभी की पृष्ठभूमि बिहार रही है और राजनीतिक तरंग सतह के भीतर प्रवाहित रहती है। अब वे असल अखाड़े में उतरे हैं और इस बार विगत चुनाव की तरह निर्दलीय नहीं हैं वरन लालू-पासवान गठबंधन के उम्मीदवार हैं। लालू ने अपनी पत्नी के भाई साधु यादव को अवसर नहीं दिया और साधु ने प्रकाश झा के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

धुरंधर खिलाड़ी लालू ने अपने बदनाम साले से यह कहकर मुक्ति पा ली कि प्रकाश झा पासवान के उम्मीदवार हैं। दरअसल, लालू यादव बखूबी जानते हैं कि अब साधु यादव की दादागिरी वाली शैली नहीं चल सकती, क्योंकि सारे देश में चल रही परिवर्तन की हवाओं से बिहार सर्वथा अछूता नहीं है। इस बार के चुनाव में देश की ऊर्जा का अपव्यय करने वाले लोगों को भारी खामियाजा भुगतना होगा, बहुप्रचारित पावर ब्रोकरों को अपनी औकात पता चल जाएगी।

अवाम ने अपने आक्रोश को अपने सीने में दबाकर रखा है। सड़क पर हुड़दंग मचाने वाले किराए के टट्टुओं से भी अवाम खफा है। बिहार विधानसभा के लिए हुए विगत चुनाव में प्रकाश झा ने लालू के खिलाफ नीतीश कुमार का साथ दिया था, परंतु उनका ख्याल है कि सत्ता में आकर नीतीश का लालूकरण हो गया और बिहार को बदलने के बदले वह स्वयं वैसे ही हो गए जिनकी मुखालफत करते थे। यह भारतीय सत्ता का विचित्र प्रभाव है कि सबको एक जैसा कर देती है। कुर्सी के कुर्सीबल में चरित्रहीनता ही ढलती है। प्रकाश झा की फिल्में ही प्रकाश का चुनावी मैनीफेस्टो हैं, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का फैलाव है।

सत्ता में आने पर वह अपनी सिनेमाई निष्ठा के अनुरूप ईमानदारी से काम करेंगे। वे गंगाजल उठाकर प्रतिबद्ध हैं कि नैतिकता का अपहरण नहीं होने देंगे। उनके प्रतिद्वंद्वी साधु यादव को अभी इस बात का अनुमान नहीं है कि बिहार के सिनेमा प्रेमी युवा प्रकाश झा के लिए कितना काम कर सकते हैं। यूं तो पूरा भारत ही फिल्ममय है, परंतु बिहार से बड़ा सिनेमा प्रेमी कोई और प्रांत नहीं है। हिंदी फिल्मों के साथ ही बिहार में प्रतिवर्ष लगभग सौ भोजपुरी फिल्में बनती हैं। कई बार भ्रम होता है कि बिहार का जीवन किसी फिल्मी पटकथा का ही हिस्सा है। कुछ इतनी अविश्वसनीय बातें बिहार में घटित होती हैं कि वे फिल्मी ही लगती हैं।

बिहार प्राय: एक्शन अपराध फिल्म की तरह ही दिखाई पड़ता है, कभी सामाजिक फिल्म की तरह और कभी इत्तेफाक से एकाध बार प्रेम कथा की तरह लगता है। वहां के अनेक नेता गब्बर की तरह खैनी मलते हैं और उसी के अंदाज में बतियाते भी हैं। ग्रामीण अंचल में मोगंबो छाया रहता है। अधिकांश लोग रामपुरिया हैं और यह शब्द चाकू के लिए इस्तेमाल होता है। बिहार के सार्थक फिल्म बनते ही इंडिया सचमुच शाइनिंग हो जाएगा।

मेरे देश की धरती...
जयप्रकाश चौकसे Monday, July 06, 2009 12:32 [IST]

- परदे के पीछे

सोहेल खान की फिल्म ‘किसान’ में बाजार की ताकतों द्वारा किसानों को विवश करके उनकी जमीन खरीदने की कहानी का मसालेदार प्रस्तुतीकरण है। सलमान खान के सुझाव पर मनोज कुमार से निवेदन करके उनकी फिल्म ‘उपकार’ का गुलशन बावरा रचित गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती..’ का प्रयोग फिल्म में किया जा रहा है।

यह गीत प्रोमो और फिल्म के अंतिम भाग के लिए लिया जा रहा है। मनोज कुमार ने बगैर कोई धन लिए इसके सहर्ष अधिकार दिए हैं और रिकॉर्डिग कंपनी से भी इस बारे में बात कर रहे हैं।

सलीम खान ने कुछ माह पूर्व कैंसर से लड़ रहे गुलशन बावरा को आर्थिक सहायता देने की पहल की, परंतु उन्होंने कहा कि वे सक्षम हैं। अजीब न्याय यह है कि हर गीत पर संपूर्ण मालिकाना अधिकार निर्माता का होता है। कुछ दखल उसे प्रस्तुत करने वाली रिकॉर्डिग कंपनी का भी होता है, लेकिन गीतकार को सबसे कम अधिकार प्राप्त होते हैं।

गुलशन बावरा का यह गीत हर राष्ट्रीय पर्व पर गांव-गांव और गली-गली गूंजता है। पश्चिम के देशों में हर बार गीत बजाने पर रॉयल्टी देने का प्रचलन है। अगर सचमुच में भारत में इस तरह की व्यवस्था होती, तो गरीब गुलशन बावरा के घर पर हीरे-मोती की बरसात होती और उनके फर्श सोने के होते।

ग्रामीण परिवेश पर बनी तमाम फिल्मों का आदर्श सर्वकालिक महान ‘मदर इंडिया’ फिल्म है। केवल उद्देश्य की पवित्रता, किंतु नारेबाजी से भरपूर और शोर-शराबे वाली ‘उपकार’ को भी महान मान लिया जाता है। ‘उपकार’ के विस्मृत होने के बाद भी ‘मेरे देश की धरती..’ और ‘कसमें वादे प्यार वफा, सब बाते हैं..’ गीत गूंजते रहेंगे। कुछ गीत ऐसे हैं, जो फिल्मों के काल कवलित होने के बाद भी जीवित रहते हैं।

आजकल कुछ गीतकारों को प्रति गीत लाखों रुपए मिलने लगे है, परंतु पहले शैलेंद्र, शकील, आनंद बक्शी जैसे महान गीतकारों को कभी उचित पारिश्रमिक नहीं मिला। साहिर लुधियानवी पहले गीतकार थे, जिन्होंने ‘प्यासा’ की सफलता के बाद संगीतकार के बराबर पारिश्रमिक मांगना शुरू किया, जिसके कारण ‘प्यासा’ के बाद सचिन देव बर्मन के साथ उनकी कोई फिल्म नहीं आई।

चतुर व्यवसायी फिल्मकारों ने साहिर के साथ कम धन लेने वाले संगीतकार जैसे रवि, खय्याम इत्यादि के साथ उन्हें लिया। यही कारण है कि साहिर के साथ कभी नौशाद, शंकर-जयकिशन और सचिन देव बर्मन को नहीं लिया गया।

आनंद बक्शी ने सबसे अधिक गीत लिखे हैं और धुनें बनाने में भी संगीतकारों को बहुत सहयोग दिया है। उन्होंने अपने निर्माताओं पर भी अंकुश रखा है। उनकी मृत्यु के बाद सुभाष घई आज तक सफल फिल्म नहीं रच पाए। गीतकारों का योगदान प्राय: अनदेखा ही रहा है।

अधिकतम उपयोग की सोच
जयप्रकाश चौकसे Saturday, July 04, 2009 11:04 [IST]

शाहरुख खान अपने जीवन के हर क्षण को कैश करना चाहते हैं। यह अधिकतम उपयोग का दृष्टिकोण इस बाजारू दौर की देन है कि कहीं कोई क्षण अनुपजाऊ नहीं रह जाए। यह दृष्टिकोण मशीन से बहुत समानता रखता है।शा हरुख खान अमेरिका में करण जौहर की फिल्म ‘माय नेम इज खान’ की शूटिंग कर रहे हैं।

शाहरुख जिस होटल में ठहरे हैं, उसके प्रबंधकों ने घोषणा की है कि एक नियत दिन 250 डॉलर देकर कोई भी उनके साथ भोजन कर सकता है। उनके साथ एक ही मेज पर खाने के ज्यादा पैसे लगेंगे और उनके साथ फोटो खिंचवाने का रेट अलग है। गोयाकि होटल प्रबंधन ने शाहरुख को मेन्यु की तरह प्रस्तुत किया है।

यह भी बताया गया है कि इस तमाशे से अर्जित आय किसी सामाजिक संस्था को दी जाएगी। उद्देश्य अच्छा है, साधन जायकेदार है। सुना है कि सैकड़ों आप्रवासी भारतीय इस भोज में शामिल होने के इच्छुक हैं और यह महाभोज साबित हो सकता है। यह भोज किसी प्रचार के लिए नहीं है, क्योंकि अमेरिका में शाहरुख के प्रशंसकों की संख्या बहुत विशाल है और उनकी अभिनीत फिल्म को किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रकरण में गौरतलब यह है कि शाहरुख खान अपने जीवन के हर क्षण को कैश करना चाहते हैं, चाहे वह सामाजिक संस्था के लिए हो या स्वयं के लिए। यह अधिकतम उपयोग का दृष्टिकोण इस बाजारू दौर की देन है कि कहीं कोई क्षण अनुपजाऊ नहीं रह जाए।

यह दृष्टिकोण मशीन से बहुत समानता रखता है जो निरंतर चलती रहती है। मनुष्य अधिकतम क्षणों में अनुपयोगी ही रहता है मसलन जीवन में से खाने-पीने और सोने के समय को घटा दें तो वक्त आधा ही रह जाता है। कुछ लोग प्रतिदिन घंटों अलसाए से रहते हैं।

दरअसल जीवन घटना प्रधान नहीं है, वह एक्शन फिल्म नहीं है। दूर से देखने वाले को कॉमेडी और नजदीक से देखने पर त्रासदी लग सकता है। दरअसल अनमने से अलसाए क्षण जब हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं, उन्हें भी सर्वथा अनुपयोगी या अनुपजाऊ नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि यह शून्य भी बहुत महत्वपूर्ण और सार्थक होता है।

दुनिया में सृजन और अन्वेषण के अनेक कार्य ऐसे ही क्षणों में हुए हैं। न्यूटन झाड़ के नीचे कोई उपयोगी काम नहीं कर रहे थे। शायद वे धूप से बचने के लिए सुस्ता रहे थे। उस साधारण से क्षण में फल उनके सिर पर गिरा और उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोज निकाला।

मैडम क्यूरी प्रयोगशाला मंे काम करते हुए थक गईं थीं और अपनी असफलता पर खिन्न थीं। सुस्ताने के तथाकथित क्षणों में ही एक विचार कौंधा और एक खोज हो गई। बाथटब में नहाते हुए ही आर्किमिडीज ‘यूरेका-यूरेका’ कहते हुए भागे थे।

दुनिया को चलाने वाली केंद्रीय शक्ति हमेशा प्रेम ही रहा है और वह तथाकथित तौर पर अनुपयोगी क्षणों में ही होता है। यह कोई सोची-समझी साजिश की तरह नहीं होता, बकौल गालिब साहब, ‘है यह वो आतिश जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे।’ यह प्रेम ही है जिसके कारण मनुष्य मशीन से अलग है।

हर क्षण की उपयोगिता, शरीर की हरकत की उर्वरकता, हर सांस की सार्थकता जिंदगी को बनिए का खाता या कॉरपोरेट की बैलेंस शीट बना देता है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण युद्ध नहीं कर रहे थे, वे सबसे कम सक्रिय थे, परंतु उस गाथा के नायक तो वही हैं।

बाजार की ताकतें और शिक्षण व्यवसाय
जयप्रकाश चौकसे Friday, July 03, 2009 12:03 [IST]

- परदे के पीछे

सुभाष घई की सचमुच की पहली बड़ी सफलता ‘राम लखन’ थी और ‘सौदागर’ तथा ‘खलनायक’ ने भी उन्हें कुछ लाभ दिया था। इसके बाद उनकी ‘परदेस’ और ‘ताल’ अच्छी फिल्में रहीं, परंतु विशेष लाभ नहीं हुआ। विगत पंद्रह वर्षो में उन्होंने कोई सचमुच की भव्य सफलता अर्जित नहीं की है और केवल ‘इकबाल’ के रूप में सार्थक फिल्म दी है।

उन्होंने ‘युवराज’ के इंजन में लगे कुछ डिब्बों को नकली बढ़त के दौर में अच्छे मूल्य में बेचकर लाभ तो कमाया, परंतु सफल फिल्मकार की प्रतिष्ठा खो दी है। उनके पटरी पर से उतर जाने का दुख सभी को है, परंतु उनकी ‘हीरो’ के अतिरिक्त सारी सफलताएं सितारों के दम पर अर्जित थीं और बतौर निर्देशक उनका विकास अवरुद्ध हुए जमाना गुजर चुका है।

सुभाष घई ने बड़े साहस और नेक इरादों से फिल्म प्रशिक्षण संस्थान खड़ा किया है, जिसकी फीस इतनी अधिक है कि केवल अमीर घर के युवा ही दाखिला ले सकते हैं। गौरतलब है कि विगत वर्षो में उनके संस्थान से कोई भी सफल सितारा या कुशल निर्देशक बाहर नहीं आया है, क्योंकि सुविधाओं के जुटाने से संस्थान महान नहीं होता, बल्कि कच्ची मिट्टी में आकृति गढ़ने के विकास से हमारी संस्थाएं महान बनती हैं। जब संस्था का जन्मदाता ही एक अदद सफलता के लिए अंधेरे से जूझ रहा हो, तब वह संस्था में क्या मिसाल रख सकता है।

भारत में सभी क्षेत्रों में फैशनेबल सुविधा-संपन्न और ठाठ-बाट वाली शिक्षण संस्थाओं की कुकुरमुत्ता बाढ़ आ गई है, परंतु सार्थक गुणवत्ता कहीं नजर नहीं आती। यह एक गंभीर चिंतनीय समस्या है और सुभाष घई के बहाने हम इसी की बात कर रहे हैं। संस्थाओं को समर्पित शिक्षक बनाते हैं। सीमेंट और संगमरमर से इमारतें गढ़ी जाती हैं, परंतु वे संस्थाएं नहीं बनतीं।

आज हर क्षेत्र में अच्छे शिक्षकों का अभाव है। अच्छे शिक्षक मोटे मेहनताने से नहीं मिलते। एक स्वस्थ, उच्च जीवन मूल्यों वाले समाज में अच्छे शिक्षक का जन्म होता है। हमारे बीमार समाज से संस्कारवान शिक्षक कैसे निकल सकते हैं। सारे सुधार का केंद्र केवल परिवार ही हो सकता है, जो बच्चों का पहला स्कूल है। जीवन की आपाधापी में फंसे पालकों के पास आदर्श पिता बनने का समय नहीं है। हर परिवार के तालाब में कम से कम एक गंदी मछली है और उसके प्रदूषण से कैसे बचें, बस यही मूल समस्या है।

समाज और राष्ट्र में कहीं कोई आदर्श सामने नहीं आ रहा है। सब तेज गति से भाग रहे हैं और कोई कहीं पहुंच नहीं रहा है। भीतर की यात्रा की ऊर्जा रेगिस्तान निगल रहा है। सुना है कि सुभाष घई ने जवानी में जैतून का तेल बेचा है।

गोयाकि वे सेल्समैन रहे हैं। अगर यह खबर सही है तो वे पुन: सेल्समैन हो गए हैं। अब शोमैन से वे कैसे सेल्समैन हो गए, यह उन्हीं के विचार करने का मसला है। हमारे लिए यह जरूरी है कि हम खुद को टटोलें कि क्या हम भी सेल्समैन या मिडिलमैन हैं?

मरकर भी चैन न मिला
जयप्रकाश चौकसे Tuesday, June 30, 2009 12:05 [IST]

- परदे के पीछे

जीवन में तरह-तरह के दबाव बनते हैं और हमें समझौते करने पड़ते हैं। आदमी स्वतंत्र पैदा होता है परंतु सारी उम्र जंजीरों से जकड़ा रहता है, गोयाकि जीने के लिए बार-बार मरना पड़ता है। परंतु प्रसिद्ध लोग मरने के बाद भी तरह-तरह से कई बार मारे जाते हैं। ‘गर मरकर भी चैन नहीं पाए तो कहां जाएंगे..।’

प्रिंसेज डायना की तरह माइकल जैक्सन की मौत को भी तमाशा बना दिया गया है। यही सब मर्लिन मुनरो के साथ भी हुआ था और उनकी मृत्यु, हत्या या आत्महत्या के विवाद पर आज भी किताबें लिखी जा रही हैं। माइकल जैक्सन की ऑटोप्सी दो बार हो चुकी है, गोयाकि शरीर की चीड़-फाड़ के साथ रासायनिक परीक्षण के लिए कई चीजें की जा रही हैं।

उनकी पूर्व पत्नी लिजा प्रिस्ले (जिनके साथ वर्ष 94 में शादी और 96 में तलाक हुआ) का कहना है कि माइकल जैक्सन को प्राय: यह भय होता था कि वे एल्विस प्रिस्ले (42 वर्ष की उम्र में निधन) की तरह कम उम्र में मर जाएंगे। ज्ञातव्य है कि प्रिस्ले की मृत्यु का रहस्य बना हुआ है, परंतु स्थापित धारणा यह है कि वे नैराश्य मिटाने और दर्द कम करने की अनेक दवाएं लिया करते थे।

माइकल जैक्सन को डेमेरोल नामक दर्दनिवारक दवा के तीन इंजेक्शन रोज दिए जाते थे। मांसपेशियों के तनाव को दूर करने के लिए वे प्राय: सोमा नामक ड्रग लेते थे। चिंता समाप्त करने की दवा भी लेते थे। यह आश्चर्य की बात है कि सफलता के शिखर पर बैठे व्यक्ति को चिंता सताती थी, नैराश्य घेरे रहता था। अनाम अपरिभाषित दर्द की सेज पर पड़े-पड़े ही उन्होंने प्यार के नगमे गुनगुनाए हैं।

अमीर और प्रसिद्ध लोगों को अजीबोगरीब रोग होते हैं। मजदूर और मेहनतकश को दर्द नहीं होता। नैराश्य क्या है, वह यह भी नहीं जानता। पत्थर सी सख्त सेज पर वह घोड़े बेचकर सोता है। सफलता और प्रसिद्धि का रोलर कोस्टर मजबूत आदमी को भी विचलित कर देता है। ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं, इधर-उधर तीव्र गति से चलने वाले झूले को रोलर कोस्टर कहते हैं।

सफल व्यक्ति को असफलता से बड़ा भय लगता है। चकाचौंध भरे जीवन में दृष्टिदोष विकसित हो जाते हैं। लगातार कैमरे के फ्लैश बल्ब आंख के पर्दे पर जुल्म ढाते हैं। प्रसिद्ध व्यक्ति का जीवन प्रत्यंचा पर थरथराते हुए तीर की तरह होता है। माइकल जैक्सन के शो की श्रंखला 15 जुलाई से प्रारंभ होने वाली थी और उन पर गहरा मानसिक दबाव था।

लगातार मनोरंजन करने का तनाव कलाकर झेल नहीं पाता और सफलता के सर्कस में शरीर व मन के साथ खिलवाड़ होता है। पूंजी निवेशकों का दबाव जानलेवा होता है। माइकल जैक्सन की अमर रचना ‘चाइल्डहुड’ काफी हद तक आत्म-कथात्मक रचना है। वह आर्तनाद करता है कि कोई मुझे समझता नहीं। वे मेरे खेल और जीवन को सनकीपन की लहर समझते हैं और मैं भी बच्चे की तरह निरंतर गुलाटियां खाता हूं। यह मेरी नियति है कि मैं अपने खोए बचपन का पर्याय ताउम्र खोजता रहूं।

उन्होंने सफलता के शिखर दिनों में 2700 एकड़ की जायदाद खरीदी थी और नाम दिया था ‘नेवरलैंड’ अर्थात असंभव जगह। वह अपनी कल्पना में यहां बचपन का लुका-छिपी खेल खेलते थे। वह जो कुछ खोज रहे थे, दरअसल यथार्थ में ऐसा कुछ था ही नहीं। जीवन की माया या विष्णु का स्वप्न उनके लिए यथार्थ था और दुनियादारी कल्पना थी।

दरअसल माइकल जैक्सन एक व्यथित व्यक्ति थे, अनाम से आध्यात्मिक दर्द से पीड़ित। क्या तलाश थी, उन्हें पता नहीं था। हममें से किसी को भी नहीं पता होता। वह मनोरंजन जगत के हंसते-गाते, रोते-बिलखते जोकर थे।

निरंतर सनसनी की खोज को पैदा करने वाली व्यवस्था में इस तरह के हादसे होते ही हैं। सामान्य और आम जीवन की अवहेलना इसी तरह की तरंग को जन्म देती है। माइकल जैक्सन के जीवन और मृत्यु का रहस्य उनके बचपन में छिपा है, जिसे व्यावसायिकता ने लील लिया।

Sunday, July 5, 2009

जयप्रकाश चौकसे




माधुरी, मनोरंजन, मस्ती और माधुर्य
जयप्रकाश चौकसे
Saturday, December 01, 2007 00:32 [IST]
http://www.bhaskar.com/2007/12/01/0712010049_aaja_nachle.html


परदे के पीछे.
आदित्य चोपड़ा, निर्देशक अनिल मेहता और जयदीप साहनी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने माधुरी दीक्षित अभिनीत ‘आजा नच ले’ को एक अत्यंत मनोरंजक और सामाजिक सौद्देश्यता वाली फिल्म की तरह गढ़ा है। इसे देखने के बाद दर्शक बहुत ही प्रसन्नता के साथ थिएटर से बाहर निकलता है और कई लोग नम आंखों को छुपा नहीं पाते। कुछ चेहरों पर सूखे हुए आंसुओं के निशान देखे जा सकते हैं।

कमाल की बात यह है कि माधुरी की केंद्रीय भूमिका वाली इस फिल्म में ढाई दर्जन सहायक भूमिकाएं हैं और सभी अभिनेताओं ने माधुरी की वापसी को सार्थक बनाने के लिए अपनी भूमिकाओं में प्राण फूंक दिए हैं। कुनाल कपूर (रंग दे बसंती) कोंकणा सेन शर्मा, दिव्या दत्ता, दर्शन जरीवाला, रघुवीर यादव, विनय पाठक, रनवीर शोरी, इरफान खान, मुकेश तिवारी ने अपनी भूमिकाएं जड़ाऊ अंदाज में की हैं। हीरे के नेकलेस में छोटे मोती, हीरे, नीलम इत्यादि पत्थरों को जड़ा जाता है। मामला कुछ ऐसा ही है। इस फिल्म के लेखक ने रोजमर्रा बोली जाने वाली भाषा में कमाल के संवाद लिखे हैं। पूरी फिल्म में हास्य, विट इस तरह प्रस्तुत है कि दर्शक को पसलियों के पास अदृश्य उंगलियों द्वारा की गई गुदगुदी महसूस होती है। ‘चख दे इंडिया’ की तरह यह फिल्म भी आपके दिल को झंकृत करती है।

फिल्म में गंभीर सामाजिक तथ्यों की भीतरी लहर भी मौजूद है। एक छोटे शहर में सांस्कृतिक गतिविधियों के ‘अजंता’ नामक केंद्र को नष्ट करके वहां मॉल और मल्टीप्लैक्स गढ़ा जाने वाला है। एक चतुर व्यापारी
को यह दंभ भी है कि सरकार या अफसर नहीं वरन व्यापारी देश को चला रहे हैं। यथार्थ जीवन में यह सच है कि बाजार की ताकतों ने संसद को अपने कब्जे में किया है और ‘सेज’ बतर्ज नंदीग्राम बनाने के लिए जोर जबरदस्ती जारी है। जैसे मशीन के साथ जीवन शैली आती है वैसे ही मॉल और मल्टीप्लैक्स के साथ उपभोग और दिमागी अय्याशी का एक पूरा संसार भी साथ आता है। आज हम जिस ग्रेनाइट और संगमरमरी प्रगति पर इतरा रहे हैं, उसके भीतर कितनी सड़ांध है इसका अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। इस मनोरंजक फिल्म में इस तरह के गंभीर इशारे हैं, परंतु पूरा स्वरूप भावना से ओतप्रोत ही रखा गया है।


राजकपूर की फिजूलखर्ची
परदे के पीछे
जयप्रकाश चौकसे
Friday, December 14, 2007 00:03 [IST]
http://www.bhaskar.com/2007/12/14/0712140019_raj_kapoor.html


सृजन करने वाले के चलने-फिरने, खाने-पीने का कोई अर्थ नहीं होता। उसके लीन हो जाने और डूबजाने से ही उसे मुक्ति और सार्थकता मिलती है।



आज राजकपूर का 83वां जन्मदिन है। उनके समकालीन देवआनंद और दिलीपकुमार आज भी सक्रिय हैं और उम्र में उनसे बरस दो बरस बड़े भी हैं। अपनी फिल्मों को भव्यतर बनाने की तरह राजकपूर अपनी उम्र के मामले में भी फिजूलखर्च रहे। स्वयं को बचाकर चलना उन्होंने कभी जाना ही नहीं। डूबकर दरिया के पार जाने का अंदाज उनके काम में भी था और जीवन में भी। आग के दरिया से ऐसे ही गुजरते हैं। इश्क से सराबोर जीवन में और क्या हो सकता था। दास्तान-ए-राजकपूर अजीब सी रही, कहां से शुरू हुई और खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। फिल्म जिस निगेटिव पर बनती है, वह ज्वलनशील सेल्युलाइड है परंतु उस पर रचे अफसाने मरते नहीं क्योंकि दरअसल वे दर्शक के मन में गढ़े गए हैं। परदे पर स्टील के बने प्रोजेक्टर से दिखाई गई फिल्में दरअसल दर्शक के मन में ही गढ़ी जाती हैं और वहीं सदा कायम भी रहती हैं। सिनेमाघर में छाए हुए अंधेरे का दर्शक का मन की अंधेरी गुफा से गहरा रिश्ता है। परदे पर प्रस्तुत उजास तो महज बहाना है। तर्कोतर यह खेला विचित्र है।
गुजरात के एक बालक ने ‘बूट पॉलिश’ देखकर भीख मांगना छोड़ दिया। आज उसके नाती-पोते शिक्षित और सफल लोग हैं और उन्हें गुमां भी नहीं कि उनकी कुंडली के योग एक फिल्म ने बदले हैं। दर्शक का कोई अनुभव जब वह परदे पर अभिनीत होते देखता है तो उसकी आत्मा के तार झंकृत हो उठते हैं। यादों से फिल्में बनती हैं और दर्शक के दिल में यादों की तरह बस जाती हैं। धर्म हो या सृजन कार्य, सब कुछ आपके डूब जाने की क्षमता पर निर्भर करता है। यह लीन हो जाना ही सार्थकता है। राजकपूर के पास डूब जाने की अद्भुत क्षमता थी। यह उनकी भावना की तीव्रता ही है जिसके कारण ‘संगम’ जैसी घोर अतार्किक फिल्म भी अपनी सिनेमाई लहर के कारण सफल रही। यह कैसे यकीन कर सकते हैं कि उस नायक को हिंदी पढ़ना नहीं आती, जो बाद में एयरफोर्स में चुना गया। अगर गोपाल के नाम राधा का लिखा प्रेमपत्र सुंदर पढ़ लेता तो कहानी दूसरी रील में समाप्त हो जाती।
वर्ष 1982 में राजकपूर सामंतवादी पृष्ठभूमि पर एक युवा विधवा की प्रेम कहानी बनाते हैं और एक्शन फिल्मों के शिखर दौर में फिल्म सफल रहती है। उस दौर में बूढ़े राजकपूर ने ऐसी हिम्मत दिखाई कि बरबस आपको हेमिंग्वे के ‘ओल्डमैन एंड द सी’ की याद आ जाती है। तूफान का अंदेशा है और बूढ़ा मछलीमार अपने काम पर चल पड़ा।
निर्माणाधीन पेंटिंग देखकर आपको उसके प्रभाव का अनुमान नहीं होता, क्योंकि ‘मास्टर’ ने अभी दो-तीन स्ट्रोक्स और लगाना है। ‘राम तेरी गंगा मैली’ बन चुकी थी कि राजकपूर ने तीन दृश्य जोड़े- एक में नायक का ससुर कलकत्ता से बनारस जाते हुए पूछता है कि वह उसके लिए क्या लाए तो नायक कहता है कि बनारस से गंगा लाइए। वह सचमुच ले आया और हकीकत मालूम होते ही मौसा को बोला कि कलकत्ता से गंगा को बनारस वापस कर दें। मौसा ने कहा कि गंगा उल्टी नहीं बहती। इस राजकपूर स्पर्श के लिए अपनी संस्कृति में आकंठ डूबना होता है। सृजन करने वाले के चलने-फिरने, खाने-पीने का कोई अर्थ नहीं होता। उसके लीन हो जाने और डूब जाने से ही उसे मुक्ति और सार्थकता मिलती है।
किनारे पर बैठकर नदी में कंकड़ फेंकने से कुछ नहीं होता। प्रतीकात्मक चुल्लू भर पानी माथे पर लगाने से कुछ नहीं होता। इस डूब जाने के लिए ही राजकपूर ने खुद को बेतहाशा खर्च किया। आप अतिरिक्त असबाब लेकर डूब कैसे सकते हैं। आप कोई भी काम करें, उसमें पूरी तरह डूबकर करें- राजकपूर के जीवन से हमें यही प्रेरणा मिलती है।


आज भी जारी है रफी प्रभाव
जयप्रकाश चौकसे
Saturday, December 15, 2007 00:49 [IST]
http://www.bhaskar.com/2007/12/15/0712150059_mohammad_rafi.html

परदे के पीछे. बोनी कपूर की अनिल-पद्मिनी कोल्हापुरे अभिनीत ‘वो सात दिन’ और सनी देओल की प्रवेश फिल्म ‘बेताब’ में नए गायक शब्बीर को अवसर दिया गया और प्रारंभिक सफलता से आशा जगी कि वे मोहम्मद रफी की तरह के गायक सिद्ध होंगे। परंतु एक ही सदी में दो मोहम्मद रफी संभव ही नहीं हैं। शब्बीर के पास सीमित प्रतिभा थी, जिसे घोर रियाज और अनुशासन के सहारे काफी दूर तक ले जाया जा सकता था, परंतु पार्श्वगायन के क्षेत्र में इस तरह की साधना आसान नहीं होती।
लता मंगेशकर और आशा इस उम्र में भी रियाज करती हैं, क्योंकि वह उनके लिए सांस लेने की तरह स्वाभाविक प्रक्रिया है। उस दौर में नए नायकों के लिए किशोर कुमार का आग्रह था कि उनके पुत्र अमित को लिया जाए। संगीतकार ‘रफी प्रभाव’ चाहते थे, इसलिए शब्बीर को अवसर मिले। आज 25 बरस बाद, पार्श्वगायन क्षेत्र से खदेड़े जाने के बाद भी शब्बीर की रोजी-रोटी रफी साहब की वजह से चल रही है। उन्हें रफी के चाहने वाले अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करते हैं और ‘रफी प्रभाव’ की झलक मात्र के लिए उन्हें धन देते हैं। ऊपर से भी रफी साहब ने अपने ‘एकलव्यों’ पर कृपा दृष्टि बनाई हुई है।
हाल ही में इंदौर के उद्योगपति एसएस भाटिया ने अपने पारिवारिक समारोह में शब्बीर का कार्यक्रम रखा और शाम को रफीमय करने के प्रयास हुए। इत्तेफाक की बात है कि समारोह में शब्बीर को अवसर देने वाले बोनी कपूर के साथ ‘वो सात दिन’ की नायिका पद्मिनी कोल्हापुरे भी मौजूद थीं और मेजबान के आग्रह पर पद्मिनी ने अपनी सफलतम फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ का एक गीत गाया। उनकी अदायगी इतनी भावप्रवण थी कि श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो गए।
आश्चर्य है कि पद्मिनी ने कभी व्यावसायिक पार्श्वगायन के क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया। उनके पति निर्माता टूटू शर्मा भी इस मामले में पहल नहीं करते। ज्ञातव्य है कि लता मंगेशकर पद्मिनी की रिश्ते में बुआ लगती हैं। मराठीभाषी परिवारों में संगीत और नाटक के प्रति घोर श्रद्धा व साधना का भाव हमेशा रहा है और इसलिए उनके घर प्रतिभा का पालना सिद्ध होते रहे हैं। मैंने एक बार लताजी से पूछा था कि क्या वर्तमान बाजार युग में मध्यमवर्गीय मराठी परिवारों में साधना और श्रद्धा का भाव घटा है। वे इस मामले में थोड़ी चिंतित ही ध्वनित हुईं।
रफी, मुकेश, किशोर की यादों में आयोजित कार्यक्रम सिद्ध करते हैं कि माधुर्य अपने सक्रियता के कालखंड में सीमित नहीं रहता, वह कालजयी है। अपनी विलासिता में आकंठ लिप्त हम प्रकृति और धरती को नष्ट कर रहे हैं, साथ ही अनावश्यक शोर द्वारा अजर-अमर ध्वनि में भी प्रदूषण फैला रहे हैं।


पारिश्रमिक लेकर तिथि देता है अतिथि
जयप्रकाश चौकसे
Tuesday, December 18, 2007 01:35 [IST]

परद के पीछे.
राकेश रोशन की गैर रितिक फिल्म ‘क्रेजी 4’ में रितिक पर फिल्माए जाने वाले गीत की शूटिंग स्थगित कर दी गई है क्योंकि रितिक सिंगापुर में अपने घुटने का इलाज करा रहे हैं। रजनीकांत अभिनीत ‘शिवाजी’ के लिए प्रसिद्ध निर्देशक शंकर अपनी प्रस्तावित फिल्म ‘रोबोट’ की पटकथा रितिक को सुनाएंगे। ज्ञातव्य है कि यह फिल्म शाहरुख के लिए बनाने की बात तय हो चुकी थी और प्रारंभिक राशि भी मिल चुकी थी, परंतु मिजाज में अंतर के कारण समझौता रद्द हो गया। बहरहाल, खबर है कि राकेश रोशन ‘क्रेजी 4’ के आइटम के लिए शाहरुख से निवेदन करेंगे। फिल्मों में अतिथि भूमिका का चलन इस तरह प्रारंभ हुआ कि छोटी परंतु महत्वपूर्ण भूमिका के लिए व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर बड़े सितारे से प्रार्थना की जाती थी और वह पारिश्रमिक नहीं लेता था। विगत वर्षो में अतिथि भूमिका के लिए धन लिया जाने लगा है, क्योंकि सितारे जानते हैं कि उनकी मौजूदगी फिल्म को अतिरिक्त आय दे रही है। कुछ निर्माताओं ने नारीप्रधान फिल्मों में अतिथि भूमिका को पटकथा से जोड़ा, क्योंकि इन्हें बेचने में कठिनाई होती है। मसलन बोनी कपूर ने अपनी करिश्मा कपूर अभिनीत ‘शक्ति’ में शाहरुख-ऐश्वर्या का आइटम शूट किया।
आजकल टेलीविजन पर प्रस्तुत प्रचार प्रोमो के लिए भी पटकथा के परे आइटम रचे जाते हैं और आयटम का मूल्य सितारे के कारण बढ़ता है। करण जौहर की पहली फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ में सलमान की अतिथि भूमिका के कारण उन्हें दिए गए नाममात्र के पारिश्रमिक से कई गुना अधिक मुनाफा हुआ। अत: यह अतिथि भूमिकाओं का चक्कर ‘देवो भव’ नहीं है, वरन बहुत बड़ा व्यवसाय है। कुछ अतिथि भूमिकाएं सचमुच निशुल्क होती हैं जैसे सलमान और कैटरीना अतुल अग्निहोत्री(सलमान की बहन अलवीरा के पति) की फिल्म में काम कर रहे हैं। शाहरुख ने अपनी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में दो दर्जन सितारे बुलाए, जिन्होंने कोई धन नहीं लिया, परंतु शाहरुख ने उन्हें अत्यंत महंगी घड़ियां भेंट में दीं। सितारे और उद्योगपति जिस तरह की घड़ियां उपहार में देते हैं, उनका मूल्य पांच से पंद्रह लाख रुपए प्रति घड़ी होता है। जिनका समय ही बलवान है, उन्हें इस राशि से क्या फर्क पड़ता है।
जब संजय दत्त ‘कांटे’ का निर्माण कर रहे थे, तब अमिताभ ने इस नाते कि सुनील दत्त ने उन्हें वर्ष 1971 में आई ‘रेशमा और शेरा’ में अवसर दिया था, उनसे पारिश्रमिक नहीं लिया, परंतु कुछ समय बाद ही अपनी फिल्म ‘विरुद्ध’ में संजय दत्त से अतिथि भूमिका करा ली। इस खेल में लेन-देन इस तरह भी होता है। यहां कोई चीज मुफ्त में नहीं मिलती, सिर्फ लेन-देन के स्वरूप बदल जाते हैं। इस तरह करेंसी अपनी परिभाषा के परे चली जाती है। अगर किसी ने आप पर दया दृष्टि डाली है तो समझ लीजिए कि किसी अदृश्य बहीखाते में आप पर एक हुंडी दर्ज कर ली गई है।
नायिकाएं भी नाप-तौलकर मुस्कराहट देती हैं, कहीं एक बटा चार इंच, कहीं गालों में दर्द पड़ जाए, वहां तक। होटलों और हवाईजहाजों की परिचारिकाएं सारे समय मुस्कराती रहती हैं, क्योंकि उन्हें इसी का वेतन मिलता है। टेलीविजन पर प्रस्तुत हास्य उद्योग के सारे सितारे घर जाकर अपने परिवार के लिए हंस नहीं पाते, क्योंकि हंसी का माद्दा बेचकर ही परिवार का पोषण हो रहा है। मुस्कान उद्योग में नेताओं की हंसी बहुत ही जहर भरी होती है।



सिनेमा में पूंजी निवेशक की भूमिका

जयप्रकाश चौकसे
Wednesday, December 12, 2007 00:26 [IST]


परदे के पीछे:कुछ दिन पूर्व ‘इंडिया टुडे’ के संस्थापक श्री वीवी पुरी का देहावसान हो गया। मीडिया किंग होते हुए भी उन्होंने कभी स्वयं को प्रचारित नहीं किया और उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में कभी कुछ प्रकाशित नहीं हुआ। इस फिल्म कॉलम में उन्हें आदरांजलि प्रस्तुत की जा रही है, क्योंकि एक जमाने में पुरी साहब फिल्मों में पूंजी निवेश करते थे। राज कपूर की ‘आग’ को व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, परंतु पारखी पुरी साहब ने राज कपूर से 50 प्रतिशत लाभ के आधार पर पूंजी निवेश का अनुबंध किया और ‘बरसात’ से ‘जागते रहो’ तक की फिल्मों में उन्होंने पूंजी लगाई। उन्होंने बलदेवराज चोपड़ा की फिल्मों में भी धन लगाया। हिंदुस्तानी सिनेमा में ‘कलर’ के आते ही सामाजिक प्रतिबद्धता हाशिए पर फेंक दी गई और इसी मोड़ पर पुरी साहब ने फिल्में छोड़ दीं। 1970 में राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता के बाद पुरी साहब ने राज कपूर के साथ बनाई 6 फिल्मों पर से अपने अधिकार हटा लिए और पूरा स्वामित्व राज कपूर का हो गया।
‘इंडिया टुडे’ में भी फिल्मों की तरह उनका आग्रह सामाजिक प्रतिबद्धता का रहा है और आज भी उन्हीं आदर्श मूल्यों का निर्वाह हो रहा है। उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ में मासिक न्यूज वीडियो भी प्रारंभ किया था, जो एक प्रकार से आज प्रचलित न्यूज चैनल का पूर्वानुमान माना जा सकता है।
आज फिल्म उद्योग में कारपोरेट और बैंक का धन उपलब्ध है, परंतु चौथे और पांचवें दशक में जब विपुल प्रतिभा मौजूद थीं, तब धन मिलना मुश्किल होता था। उस दौर में विभाजन के बाद मुंबई आए सिंधी और पंजाबी लोग फिल्म में पूंजी निवेश के लिए आगे आए और उनकी ब्याज की दर बहुत ऊंची थी। उस दौर में पुरी ने सुरक्षित ब्याज के बदले लाभ और हानि में भागीदारी की तथा जोखिम भी उठाया।
सातवें दशक में हिंदुजा परिवार ने फिल्म पूंजी निवेश क्षेत्र में राज कपूर की ‘बॉबी’ से प्रवेश किया। उसी दौर में जीएन शाह बहुत बड़े पूंजी निवेशक के रूप में उभरे। 1985 से भरत भाई शाह ने प्रवेश किया। इसके अतिरिक्त कई एजेंट ऐसे थे, जो अनेक व्यापारियों से थोड़ी-थोड़ी पूंजी लेकर इकट्ठा किया हुआ धन 36 प्रतिशत ब्याज पर निर्माता को देते थे और फिल्म निर्माण में विलंब के कारण तीसरे वर्ष लिए लाख पर ब्याज देने के बाद कुछ भी हाथ में नहीं आता था। पुरी साहब के अतिरिक्त किसी भी पूंजी निवेशक का आग्रह सामाजिक प्रतिबद्धता का नहीं रहा।
यह एक अत्यंत लोकप्रिय भ्रम है कि अपराध जगत ने स्वयं की छवि को गरिमामंडित करने के उद्देश्य से फिल्मों में धन लगाया। दरअसल उन्होंने कभी धन लगाया ही नहीं। वे केवल सफल व्यक्ति से धन ऐंठते थे, जैसा कि अन्य क्षेत्रों में भी करते थे। अपराध जगत के लोग अपनी जवानी में सितारों के प्रशंसक रहे, अत: ताकत आते ही उनसे मेल-जोल बढ़ाने के प्रयास उन्होंने किए।
1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए पैरियर रिपोर्ट के अधिकारियों को दादा साहब फाल्के ने बताया था कि फिल्मों का बजट बढ़ते ही इसकी सामाजिक प्रतिबद्धता घटेगी और गलत मूल्यों में यकीन करने वालों का पैसा फिल्मों को तमाशे में तब्दील कर देगा। फिल्मों के जनक के अनुमान गलत नहीं थे। बहरहाल, किसी भी संस्था ने फिल्मों में पूंजी के प्रवाह पर शोध नहीं किया। इस तरह के शोध से सिनेमा और समाज के बदलते स्वरूप पर रोशनी पड़ सकती है।
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सिनेमा समाचार और जॉन अब्राहम

परदे के पीछे. जॉन अब्राहम का खयाल है कि उनकी फिल्म ‘नो स्मोकिंग’ प्रचार के अभाव के कारण असफल रही। साथ ही उन महत्वपूर्ण आलोचकों से उनकी व्यक्तिगत मित्रता नहीं है जैसी कि अन्य सितारों ने जमा रखी है, जो फिल्मों के पक्ष में हवा बनाते हैं। जॉन की तरह कई आलोचकों को भी यही भ्रम है कि उनकी वजह से फिल्म चलती है। जैसे चुनाव के विशेषज्ञ जनता को समझने के मुगालते में रहते हैं, वैसे ही फिल्म के विशेषज्ञ भी जनता को समझने के मुगालते में रहते हैं। इन सारी बातों से अपरोक्ष रूप से यह कहने की कोशिश की जा रही है कि जनता स्वयं का विवेक इस्तेमाल नहीं करती या उसे भेड़ों की तरह रेले में हांका जा सकता है। अच्छी या बुरी आलोचना एक भी टिकट नहीं बिकवा पाती, ना ही एक भी दर्शक कम कर पाती है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिनेमा शास्त्र में प्रशिक्षित नहीं होने के बावजूद भारतीय फिल्मकार फिल्म बनाते रहे हैं और फिल्म आस्वाद के अज्ञान के बावजूद दर्शक सिनेमा समझते रहे हैं। आज मौसम विशेषज्ञ शास्त्रसम्मत राय जाहिर करते हैं जो प्राय: गलत सिद्ध होती है, परंतु भारतीय कृषक आसमान देखकर ही अपनी बोवनी के समय का अनुमान लगा लेता है। इसका यह अर्थ नहीं कि विषय का शास्त्रीय ज्ञान अनावश्यक है। भारतीय मनोरंजन उद्योग में अंतश्चेतना (इंट्यूशन) का बहुत महत्व है। निर्माता द्वारा कहानी का चुनाव उसके मन की तरंग करती है और दर्शक द्वारा फिल्म को देखना भी उसकी तरंग पर ही निर्भर करता है। यह इंट्यूशन कोई दैवीय प्रेरणा नहीं है। इसके पीछे भी एक शास्त्र काम करता है। मैलकॉम ग्लैडवेल की किताब ‘ब्लिंक’ में अंतश्चेतना कैसे काम करती है, इसका विवरण प्रस्तुत किया गया है।
दरअसल मनुष्य की जिज्ञासा अपार है और वह सृष्टि के हर क्रियाकलाप का अध्ययन करके शास्त्र रचता है, परंतु सृष्टि भी उस गुरु की तरह है जो शार्गिद को एक गुर नहीं सिखाती ताकि जब शार्गिद अहंकार के क्षण में चुनौती दे तो उसे पटका जा सके। इसी तरह एक अनजान अदृश्य तरंग है, जो मतदाता या दर्शक को प्रभावित करती है। जॉन की तरह अनेक फिल्मकार अपनी असफलता को स्वीकार नहीं करते हुए दूसरों को दोष देते हैं। फिल्मकार का काम है कि सरलीकरण द्वारा दर्शक से तादात्म्य स्थापित करे और यह नहीं कर पाने पर वह बहाने खोजता है।
यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि तर्क के परे कुछ अवधारणाओं पर अकारण ही लोग यकीन कर लेते हैं। मसलन जॉन से यह पूछे जाने पर कि उन्हें बिपाशा को खो देने का भय नहीं है, उन्होंने कहा कि जब तक बिपाशा के जीवन में उनसे ऊंचा, कोई 6 फुट 2 इंच का आदमी नहीं आता, उन्हें डर नहीं है। गोयाकि बिपाशा उनकी ऊंचाई से प्यार करती हैं। प्रेम के कारण खोजना अर्थात ईश्वर के प्रति आस्था में तर्क का आधार खोजना है। वैसे हाल ही में फिल्मफेयर के मुखपृष्ठ पर जॉन-बिपाशा की तस्वीरें कामसूत्र कंडोम के विज्ञापन की याद ताजा करती हैं।

Thursday, June 11, 2009

समाज से जुड़ी विभिन्न विसंगतियों को दूर करने और समाज में नया एक विचार लाने हमने अखबार शुरू किया जिसमें बहुत हद तक कोशिश करते हैं कि समाज से जुड़े पहलुओं और व्यवहारों को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।
अब्दुल हमीद, टाइम्स आफ छग (अखबार) का प्रधान संपादक

राज के तोहफे से चौंक गई थीं शिल्पा

नई दिल्ली। मशहूर बालीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के जन्मदिन पर उनके मित्र राज कुंद्रा ने उन्हें बेहद प्यार भरा तोहफा दिया, जिसे पाकर वह चौंक गई। ये तोहफा था सरप्राइज पार्टी।
ब्रिटेन कए मशहूर रियलिटी शो बिग ब्रदर को जीत अचानक प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचीं शिल्पा ने सात जून को लंदन में अपना 34वां जन्मदिन मनाया। इस मौके पर राज द्वारा दी गई सरप्राइज पार्टी का उन्होंने खूब लुत्फ उठाया। ब्लाग के जरिए शिल्पा ने अपने तमाम प्रशंसकों से यह खुशी साझा भी की।
शिल्पा ने अपने ब्लाग में लिखते हुए बताया कि मुझे यह तो पता था कि मेरा जन्मदिन है। लेकिन यह नहीं कि उस दिन क्या होने वाला है। राज ने मुझसे कहा कि वह मुझे बर्थडे डिनर पर ले जाना चाहते हैं और मैं तैयार हो गई। जैसे ही हम दोनों ने बर्थडे डिनर के लिए पेंटहाउस सुइट में प्रवेश किया, वहां मौजूद मेरे करीब 55 दोस्त चिल्ला उठे 'हैप्पी बर्थडे', मैं आश्चर्यचकित रह गई। और तो और अचानक मुझे मेरी बहन शमिता दिखाई दी। वह केवल मेरे जन्मदिन के लिए मुंबई से आई थी। यह पार्टी राज ने दी थी और मुझे बताए बिना मेरे खास मित्रों को बुलाया था।

कालेज नहीं पहुंच पातीं बिहार की अधिसंख्य बेटियां

पटना । बिहार में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों की भागीदारी काफी कम है। पहले स्कूलों में भी इनकी संख्या अच्छी नहीं थी। लेकिन अब सरकारी प्रोत्साहन से बदलाव आया है।
आंकड़ों पर गौर करें तो छात्राओं के नामांकन का राष्ट्रीय औसत [सकल नामांकन अनुपात: जीईआर] जहां 7.7 है, वहीं बिहार में यह औसत 3.5 है। आर्थिक विपन्नता के साथ ही रूढि़वादी मानसिकता भी उच्च शिक्षा में बिहारी बालिकाओं की कम भागीदारी को जिम्मेदार है। वैसे कुछेक सालों में बिहार में परिवर्तन का चक्र जारी है।
हाल के दिनों में विकास यात्रा के क्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह अपील की थी कि लड़कियों को स्कूल भेजा जाए। हाईस्कूलों तक लड़कियों को पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना की शुरुआत की गई। वर्ष 2007-08 में जहां 1.63 लाख लड़कियों को साइकिलें दी गईं, वहीं 2008-09 में 2.72 लाख लड़कियों को उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
गांव-शहर की गलियों में लड़कियों की साइकिल का पहिया ही नहीं घूम रहा है, बल्कि परिवर्तन का सकारात्मक असर दिख रहा है। स्कूलों में नामांकन से संबंधित असर 2009 की रिपोर्ट में बताया गया है कि नामांकन दर में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है।
इसी क्रम में सरकार ने यह माना कि पोशाक की कमी भी एक वजह है, जिससे लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती। किशोरवय की लड़कियों को स्कूलों की ओर से पोशाक भी दी जाने लगी।
मानव संसाधन विभाग की वार्षिक रिपोर्ट [2008-09] का जो आकलन है, उसमें बताया गया है कि लड़के-लड़कियों के संयुक्त नामांकन का अनुपात भी राष्ट्रीय औसत 9.20 की जगह बिहार में मात्र 6.70 है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि स्नातकोत्तर डिग्री में जहां लड़कों की संख्या कला पाठ्यक्रम में 14186 है, वहीं लड़कियों की यह संख्या मात्र एक हजार 272 है। एम काम में 778 और एमएससी में मात्र 948 लड़कियां दाखिला ले पायीं। स्नातक स्तर पर कला संकाय में करीब 31 हजार लड़कियों ने जबकि एक लाख 80 हजार छात्रों ने नामांकन लिया। स्नातक विज्ञान में लड़कियों का नामांकन 26 हजार जबकि लड़कों का 77 हजार से अधिक रहा।
अभियंत्रण या तकनीकी शिक्षा में लड़कियों की संख्या करीब नौ सौ पाई गईं, जबकि लड़कों की संख्या 5495 रहीं। चिकित्सा शिक्षा में यह स्थिति कुछ अच्छी है। लड़के का नामांकन करीब छह हजार हुआ, वहीं लड़कियों की संख्या तीन हजार 900 के करीब रही। उच्च शिक्षा में बिहारी छात्र-छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ही मानव संसाधन विभाग ने स्कूलों में संसाधन बढ़ाने के साथ ही मुख्यमंत्री के निर्देश के अनुसार बिहार के सभी अनुमंडल मुख्यालय में डिग्री कालेज खोलने की पहल की है।